रानी दिद्दा की विरासत की तलाश में विश्वकर्मा सभा की ऐतिहासिक यात्रा
पूंछ के दुर्गम पहाड़ों में स्थित पैतृक किले के अवशेषों का किया अध्ययन
जम्मू। कश्मीर की प्रसिद्ध शासक रानी दिद्दा की ऐतिहासिक विरासत को समझने और उससे जुड़े स्थलों के अध्ययन के उद्देश्य से प्रदेश विश्वकर्मा सभा के प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू-कश्मीर के जिला पूंछ स्थित लोरेन गांव का दौरा किया। प्रदेशाध्यक्ष राज कुमार चलोत्रा के नेतृत्व में निकली टीम ने उस स्थान का निरीक्षण किया, जिसे स्थानीय परंपराओं और प्रतिनिधिमंडल के अनुसार रानी दिद्दा के पूर्वजों के किले का स्थल माना जाता है। इस दौरान ऐतिहासिक तथ्यों के दस्तावेजीकरण और आगे शोध की दिशा में भी चर्चा की गई।
जम्मू से लगभग 255 किलोमीटर दूर पीर पंजाल पर्वतमाला के दुर्गम क्षेत्र में स्थित लोरेन गांव तक पहुंचने के लिए टीम ने कठिन पर्वतीय मार्ग और लगातार वर्षा जैसी चुनौतियों का सामना किया। प्रतिकूल मौसम के कारण विस्तृत अध्ययन संभव नहीं हो सका, लेकिन प्रतिनिधिमंडल ने नवंबर में पुनः शोध यात्रा आयोजित कर ऐतिहासिक साक्ष्यों का विस्तृत अध्ययन करने का निर्णय लिया।
रानी दिद्दा 10वीं शताब्दी की कश्मीर की प्रमुख शासकों में गिनी जाती हैं। उन्होंने लगभग 958 ईस्वी से 1003 ईस्वी तक प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शासन किया। इतिहासकार उन्हें एक कुशल प्रशासक, दूरदर्शी रणनीतिकार और सशक्त राजनीतिक नेतृत्व के लिए याद करते हैं। उनके शासन और जीवन का उल्लेख प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ सहित अनेक स्रोतों में मिलता है।

दौरे के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने भांवला, पतराड़ा, बलशामा और सुरनकोट सहित विभिन्न स्थानों पर सामाजिक बैठकों का आयोजन किया। भांवला में प्रदेशाध्यक्ष राज कुमार चलोत्रा का स्वागत किया गया तथा केवल कृष्ण पुरी को स्थानीय इकाई का अध्यक्ष मनोनीत कर संगठन का पुनर्गठन किया गया। विभिन्न बैठकों में समाज के लोगों को श्री विश्वकर्मा लाइब्रेरी द्वारा प्रकाशित पत्रिका वितरित की गई तथा विद्यार्थियों को अध्ययन सामग्री भी प्रदान की गई।
सुरनकोट में आयोजित बैठक में लोहार समाज तथा अन्य ओबीसी समुदायों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस अवसर पर अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ के मुख्य सचिव बलवंत कटारिया ने केंद्रीय ओबीसी प्रमाण पत्र से संबंधित नियमों और आरक्षण के प्रावधानों की जानकारी देते हुए कहा कि जागरूकता के अभाव में अनेक पात्र युवाओं को लंबे समय तक आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका। उन्होंने समाज से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने और संगठित प्रयास करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान समाजसेवी स्वर्गीय मास्टर एच.डी. बेताब की धर्मपत्नी को समाज सेवा के लिए सम्मानित किया गया। साथ ही रानी दिद्दा पर स्वर्गीय बेताब द्वारा लिखित पुस्तक की प्रति उपलब्ध कराने का आग्रह भी किया गया, ताकि आगामी शोध कार्य को और अधिक प्रमाणिक बनाया जा सके।
लोरेन पहुंचने पर स्थानीय समाजसेवी हाजी मोहम्मद अब्दुल्ला ने कहा कि लोहार वंश के इतिहास की जानकारी समाज के अधिकांश लोगों तक नहीं पहुंच सकी है। उन्होंने इस ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण और नई पीढ़ी तक उसके प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रदेश विश्वकर्मा सभा ने बताया कि रानी दिद्दा और लोहार वंश से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों का व्यवस्थित संकलन कर विस्तृत शोध दस्तावेज तैयार करने की योजना है। इसके लिए इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और स्थानीय समुदाय के सहयोग से प्रमाणिक स्रोतों के आधार पर अध्ययन किया जाएगा।
इस ऐतिहासिक यात्रा में मास्टर प्रीतम वर्मा, ओम कटारिया, जोगिंदर अंगोत्रा, सुमन लता, वीना चलोत्रा, हाजी मोहम्मद अब्दुल्ला, मोहम्मद शफी, मोहम्मद शरीफ कुरैशी तथा हाजी मोहम्मद बशीर सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
